रविवार रात से इस साल का पहला चंद्र ग्रहण होने वाला है. यह पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा. इसे 'सुपर ब्लड मून' का नाम दिया गया है.
इसे ब्लड मून नाम इसलिए दिया गया क्योंकि ग्रहण के दौरान चंद्रमा लाल रंग का हो जाएगा और धरती के बेहद करीब होगा.
ज़ाहिर है, इस ख़ूबसूरत नज़ारे का दीदार करने के लिए कई लोगों की निगाहें आसमान पर टिकी होंगी. मगर चांद पर हाल के दिनों में उन लोगों की नज़र भी है, जो उसकी सतह के नीचे छिपे खनिज का दोहन करके मालामाल होना चाहते हैं.
कई कंपनियां चांद की सतह से कीमती पदार्थों का खनन करना चाहती हैं. लेकिन चांद पर स्वामित्व का दावा करने वाले इंसानों के लिए क्या कुछ कायदे-कानून मौजूद हैं?
आज से पचास साल पहले नील आर्मस्ट्रॉंन्ग ने चांद पर कदम रखा था, ऐसा करने वाले वो पहले इंसान हैं. उस वक्त उन्होंने कहा था, "एक आदमी का छोटा कदम, मानवता के लिए बड़ी छलांग."
इस मिशन पर उनके साथ उनके सहयोगी बज़ एल्ड्रिन भी गए थे. जिन्होंने नील के बाद चांद की सतह पर कदम रखा. इन दोनों ने चांद के उस मैदानी हिस्से का भ्रमण किया जो हमें धब्बे की तरह दिखाई देता है.
अपने स्पेसक्राफ्ट से नीचे उतरकर जब उन्होंने दाएं-बाएं देखा तो उनके मुंह से निकल पड़ा वहां क्या शानदार वीरानी है.
जुलाई 1969 के इस ओपोलो 11 अभियान के बाद से अबतक चांद पर कोई दूसरा मिशन नहीं गया है. 1972 के बाद वहां किसी इंसान ने कदम नहीं रखा.
मगर जल्दी स्थिति बदल सकती है क्योंकि कई कंपनियां चांद पर जाने और इसकी सतह पर सोना, प्लैटिनम या इलेक्ट्रोनिक्स में इस्तेमाल किए जाने वाले उन खनिजों का खनन करने की संभावनाएं तलाश रही हैं जो धरती पर दुर्लभ हैं.
इससे पहले इसी महीने चीन ने चांद की उस पार वाली सतह पर एक जांच अभियान उतारा है और उसने वहां पर कपास का बीज अंकुरित करने में कामयाबी पाई. चीन यहां पर शोध के लिए नया बेस स्थापित करने की संभावनाएं तलाश रहा है.
जापान की कंपनी आईफ़र्म पृथ्वी और चांद के बीच आने-जाने के लिए एक प्लैटफॉर्म बनाने की योजना कर रही है ताकि जांद के ध्रुवों पर पानी की तलाश की जाए.
मगर क्या ऐसे नियम हैं जो यह सुनिश्चित करें कि एल्ड्रिन जिस वीरानी की बात कर रहे थे, वह बनी रहे? या ऐसा तो नहीं कि पृथ्वी का इकलौता बड़ा प्राकृतिक उपग्रह कारोबार का शिकार हो जाएगा और इसके संसाधनो व ज़मीन पर नियंत्रण के लिए राजनीति होने लगेगी?
अंतरिक्ष में खोगलीय चीज़ों पर मालिकाना हक़ का मसला शीत युद्ध के समय का है, जब अंतरिक्ष अभियानों की शुरुआत हुई थी. जिस समय नासा चांद के लिए पहले अभियान की तैयारी कर रहा था, संयुक्त राष्ट्र ने 1967 में आउटर स्पेस ट्रीटी पेश की, जिसपर अमरीका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने हस्ताक्षर किए.
इस समझौते में कहा गया है, "बाहरी अंतरिक्ष, जिसमें चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंड हैं, उसे कोई राष्ट्र अपना नहीं बना सकता, कब्ज़ा करके या अन्य तरीकों से नियंत्रण करके संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता."
स्पेस स्पेशलिस्ट कंपनी एल्डन अडवाइज़र्स के निदेश जोएन वीलर इस संधि को अंतरिक्ष की महत्वपूर्ण संधि बताती हैं. इससे आर्मस्ट्रॉंग और उनके बाद जिन लोगों ने चांद पर झंडा गाड़ा, उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता. क्योंकि यह संधि किसी भी व्यक्ति, कंपनी या देश को किसी तरह के अधिकार नहीं देती.
व्यावहारिकता में 1969 में चांद पर मालिकाना हक़ और खनन आदि के अधिकारों का कोई ख़ास महत्व नहीं था. मगर अब तकनीक का विकास हुआ है और इस कारण भले ही आज नहीं, मगर भविष्य में फ़ायदे के लिए संसाधनों के दुरुपयोग की आशंका पैदा हो गई है.
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