आधुनिक नौकरियों से संतोष क्यों नहीं मिलता? क्या हम अपने काम में 'क्यों' ढूंढने की गलती कर रहे हैं जबकि हमें 'कैसे' का जवाब तलाशने की ज़रूरत है?
कभी न ख़त्म होने वाली बैठकों में हम अपना नाम और ईमेल भी भूलने लगे हैं.
मैंने पिछले दो साल आधुनिक दफ़्तरों की संस्कृति सुधारने के बारे में शोध करने और किताब लिखने में बिताए हैं. मैंने देखा है कि बहुत कुछ दुरुस्त करने की ज़रूरत है.
आधुनिक दफ़्तरों के साथ जुड़ी चुनौतियां ध्यान भटकने भर की नहीं है, बल्कि यह कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है.
मेंटल हेल्थ फ़ाउंडेशन के मुताबिक़, ब्रिटेन के 74 फ़ीसदी लोगों ने पिछले साल किसी न किसी समय तनाव से पराजित महसूस किया. इसका सबसे बड़ा कारण था उनका काम.
इसमें हैरान होने की कोई बात नहीं है. जबसे हमारे मोबाइल फ़ोन पर ईमेल आने लगे हैं, हमारा औसत कार्य दिवस दो घंटे बढ़ गया है.
कुछ अनुमानों के मुताबिक़, जिन कर्मचारियों से अपने सहकर्मियों से चौबीसों घंटे जुड़े रहने की अपेक्षा की जाती है वह सप्ताह में 70 घंटे से ज़्यादा काम कर रहे हैं.
अतिरिक्त घंटों में काम कर रहे लोगों में से आधे लोग तनाव के उच्चतम स्तर पर हैं.
यही कारण है कि सिमोन सिनेक जैसे स्वघोषित दूरदर्शियों की बातें दफ़्तरों में काम करने वालों को बेचैन करती हैं.
सिनेक का कहना है कि मिनेलियल्स (21वीं सदी में जवान हुई पीढ़ी) को काम में जुट जाने से पहले उससे जुड़े 'क्यों' को समझने की ज़रूरत है.
"महान कंपनियां कुशल लोगों को नियुक्त करके उन्हें प्रेरित नहीं करतीं. वे पहले से प्रेरित लोगों को नियुक्त करती हैं और उन्हें आगे बढ़ाती हैं."
किसी काम के प्रति प्रेरित करने के लिए सबसे पहले यह बताया जाता है कि वह काम 'क्यों' किया जा रहा है.
लेकिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सिर्फ़ 'कारण' पर ध्यान देने से असंगति और असंतोष पैदा हो रहा है.
सभी उम्र के श्रमिकों को इस सवाल का सामना करना पड़ता है, "कैसे मैं इस महान, उद्देश्य से संचालित संगठन में काम करता हूं, फिर भी खुश नहीं हूं."
कर्मचारी नियोक्ताओं को बता रहे हैं कि नौकरी पर रखते समय उनसे जो कहा गया था उसमें और असल के काम में बहुत अंतर है और इस पर काम करने की ज़रूरत है.
सुसैन फाउलर के उबर ब्लॉग पोस्ट के बाद 2018 में गूगल कर्मचारियों के वॉकआउट ने दफ़्तरों में असंतोष की यात्रा में एक और मील का पत्थर जोड़ दिया.
ये स्पष्ट होता जा रहा है कि 'क्यों' पर ध्यान केंद्रित करने से रणनीति बनाने वाले सीईओ के पीछे खड़े होने को जायज़ ठहराया जा सकता है.
लेकिन इससे थकान से चूर कर्मचारियों की कोई मदद नहीं होती. धीरे-धीरे यह महसूस किया जा रहा है कि हमें अब 'क्यों' की बजाय 'कैसे' पर ध्यान देना है.
"मैं कैसे अपनी नौकरी में ज़्यादा संतुष्ट और कम व्याकुल महसूस करूं."
ये तो तय है कि दफ़्तरों में कोई स्टीव जॉब्स नहीं हैं जो रोज़गार के नये, हल्के और चमकदार वर्जन को लॉन्च करें.
हम व्यक्तिगत रूप से अपने रोज़ के काम के डिज़ाइन में बदलाव ला सकते हैं जिससे हमारे काम का तनाव घटने में मदद मिले.
एक बार जब काम करने वाले लोग ये मान लेंगे कि 'कैसे' का सवाल अहम है तो कई लोग ये भी स्वीकार करने लगेंगे कि हम ख़ुद ही बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं.
वो पांच शहर जो 2019 में बड़े बदलाव देखेंगे
हममें से बहुत से लोगों के लिए काम का सबसे बड़ा बोझ बैठकों में लगने वाला समय है. बैठकों में शामिल लोगों की संख्या आधी करना भी बड़ा उपकार होगा.
इन्वेस्टमेंट बैंकर ब्रिजवाटर एसोसिएट्स का कहना है कि बैठकों में कम लोग रहें तो चर्चा की गुणवत्ता सुधारी जा सकती है.
चुनौती यह थी कि लोगों को लगता है कि जिस बैठक में वे नहीं हैं, वहीं पर सारी अच्छी चीज़ें हो रही हैं.
अहम मौक़े से चूक जाने के डर को ग़लत साबित करने के लिए उन्होंने सभी बैठकों को रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया.
इसके बाद किसी को शिकायत नहीं रही कि उनको बैठक में नहीं बुलाया गया या कम अहमियत दी गई. कुछ दूसरी चीज़ें भी हैं.
कर्मचारी अब इस बात से वाकिफ़ हो रहे हैं कि सही समय पर लंच ब्रेक लेने से फ़ैसले लेने की क्षमता सुधरती है और सप्ताह के अंत में थकान भी कम महसूस होती है.
सहकर्मियों के साथ कुछ पैदल चलना और साथ में चाय-कॉफी पीने की स्वीडिश परंपरा का भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
इससे हम ईमेल की थकान से बचते हैं और दिन के अंत में हमारा दिमाग़ भी तरोताज़ा रहता है.
असल में, पैदल चलने के विज्ञान को बैठकों पर भी लागू किया जा सकता है. बैठने की जगह चलते-चलते भी मीटिंग की जा सकती है.
स्टैफ़ोर्ड की स्कॉलर मारिली ओपरेज़ो ने पाया कि पैदल चलने से 81 फ़ीसदी लोगों की रचनात्मक सोच में सुधार हुआ.
ऐसे समय जबकि हम कार्य सप्ताह को हल्का करने की कोशिश कर रहे हैं, कैलेंडर में एक और मीटिंग जोड़ देना लक्ष्य के उलट लग सकता है.
लेकिन सामाजिक बैठकों की ताक़त को मान्यता मिल रही है. ब्रिटेन के कई दफ़्तरों में लोग काम बंद करके किसी लोकल पब में मिलते हैं.
Wednesday, January 30, 2019
Tuesday, January 22, 2019
लोग देखेंगे चंद्रग्रहण, पर कंपनियों की नज़रें पूरे चांद पर
रविवार रात से इस साल का पहला चंद्र ग्रहण होने वाला है. यह पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा. इसे 'सुपर ब्लड मून' का नाम दिया गया है.
इसे ब्लड मून नाम इसलिए दिया गया क्योंकि ग्रहण के दौरान चंद्रमा लाल रंग का हो जाएगा और धरती के बेहद करीब होगा.
ज़ाहिर है, इस ख़ूबसूरत नज़ारे का दीदार करने के लिए कई लोगों की निगाहें आसमान पर टिकी होंगी. मगर चांद पर हाल के दिनों में उन लोगों की नज़र भी है, जो उसकी सतह के नीचे छिपे खनिज का दोहन करके मालामाल होना चाहते हैं.
कई कंपनियां चांद की सतह से कीमती पदार्थों का खनन करना चाहती हैं. लेकिन चांद पर स्वामित्व का दावा करने वाले इंसानों के लिए क्या कुछ कायदे-कानून मौजूद हैं?
आज से पचास साल पहले नील आर्मस्ट्रॉंन्ग ने चांद पर कदम रखा था, ऐसा करने वाले वो पहले इंसान हैं. उस वक्त उन्होंने कहा था, "एक आदमी का छोटा कदम, मानवता के लिए बड़ी छलांग."
इस मिशन पर उनके साथ उनके सहयोगी बज़ एल्ड्रिन भी गए थे. जिन्होंने नील के बाद चांद की सतह पर कदम रखा. इन दोनों ने चांद के उस मैदानी हिस्से का भ्रमण किया जो हमें धब्बे की तरह दिखाई देता है.
अपने स्पेसक्राफ्ट से नीचे उतरकर जब उन्होंने दाएं-बाएं देखा तो उनके मुंह से निकल पड़ा वहां क्या शानदार वीरानी है.
जुलाई 1969 के इस ओपोलो 11 अभियान के बाद से अबतक चांद पर कोई दूसरा मिशन नहीं गया है. 1972 के बाद वहां किसी इंसान ने कदम नहीं रखा.
मगर जल्दी स्थिति बदल सकती है क्योंकि कई कंपनियां चांद पर जाने और इसकी सतह पर सोना, प्लैटिनम या इलेक्ट्रोनिक्स में इस्तेमाल किए जाने वाले उन खनिजों का खनन करने की संभावनाएं तलाश रही हैं जो धरती पर दुर्लभ हैं.
इससे पहले इसी महीने चीन ने चांद की उस पार वाली सतह पर एक जांच अभियान उतारा है और उसने वहां पर कपास का बीज अंकुरित करने में कामयाबी पाई. चीन यहां पर शोध के लिए नया बेस स्थापित करने की संभावनाएं तलाश रहा है.
जापान की कंपनी आईफ़र्म पृथ्वी और चांद के बीच आने-जाने के लिए एक प्लैटफॉर्म बनाने की योजना कर रही है ताकि जांद के ध्रुवों पर पानी की तलाश की जाए.
मगर क्या ऐसे नियम हैं जो यह सुनिश्चित करें कि एल्ड्रिन जिस वीरानी की बात कर रहे थे, वह बनी रहे? या ऐसा तो नहीं कि पृथ्वी का इकलौता बड़ा प्राकृतिक उपग्रह कारोबार का शिकार हो जाएगा और इसके संसाधनो व ज़मीन पर नियंत्रण के लिए राजनीति होने लगेगी?
अंतरिक्ष में खोगलीय चीज़ों पर मालिकाना हक़ का मसला शीत युद्ध के समय का है, जब अंतरिक्ष अभियानों की शुरुआत हुई थी. जिस समय नासा चांद के लिए पहले अभियान की तैयारी कर रहा था, संयुक्त राष्ट्र ने 1967 में आउटर स्पेस ट्रीटी पेश की, जिसपर अमरीका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने हस्ताक्षर किए.
इस समझौते में कहा गया है, "बाहरी अंतरिक्ष, जिसमें चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंड हैं, उसे कोई राष्ट्र अपना नहीं बना सकता, कब्ज़ा करके या अन्य तरीकों से नियंत्रण करके संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता."
स्पेस स्पेशलिस्ट कंपनी एल्डन अडवाइज़र्स के निदेश जोएन वीलर इस संधि को अंतरिक्ष की महत्वपूर्ण संधि बताती हैं. इससे आर्मस्ट्रॉंग और उनके बाद जिन लोगों ने चांद पर झंडा गाड़ा, उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता. क्योंकि यह संधि किसी भी व्यक्ति, कंपनी या देश को किसी तरह के अधिकार नहीं देती.
व्यावहारिकता में 1969 में चांद पर मालिकाना हक़ और खनन आदि के अधिकारों का कोई ख़ास महत्व नहीं था. मगर अब तकनीक का विकास हुआ है और इस कारण भले ही आज नहीं, मगर भविष्य में फ़ायदे के लिए संसाधनों के दुरुपयोग की आशंका पैदा हो गई है.
इसे ब्लड मून नाम इसलिए दिया गया क्योंकि ग्रहण के दौरान चंद्रमा लाल रंग का हो जाएगा और धरती के बेहद करीब होगा.
ज़ाहिर है, इस ख़ूबसूरत नज़ारे का दीदार करने के लिए कई लोगों की निगाहें आसमान पर टिकी होंगी. मगर चांद पर हाल के दिनों में उन लोगों की नज़र भी है, जो उसकी सतह के नीचे छिपे खनिज का दोहन करके मालामाल होना चाहते हैं.
कई कंपनियां चांद की सतह से कीमती पदार्थों का खनन करना चाहती हैं. लेकिन चांद पर स्वामित्व का दावा करने वाले इंसानों के लिए क्या कुछ कायदे-कानून मौजूद हैं?
आज से पचास साल पहले नील आर्मस्ट्रॉंन्ग ने चांद पर कदम रखा था, ऐसा करने वाले वो पहले इंसान हैं. उस वक्त उन्होंने कहा था, "एक आदमी का छोटा कदम, मानवता के लिए बड़ी छलांग."
इस मिशन पर उनके साथ उनके सहयोगी बज़ एल्ड्रिन भी गए थे. जिन्होंने नील के बाद चांद की सतह पर कदम रखा. इन दोनों ने चांद के उस मैदानी हिस्से का भ्रमण किया जो हमें धब्बे की तरह दिखाई देता है.
अपने स्पेसक्राफ्ट से नीचे उतरकर जब उन्होंने दाएं-बाएं देखा तो उनके मुंह से निकल पड़ा वहां क्या शानदार वीरानी है.
जुलाई 1969 के इस ओपोलो 11 अभियान के बाद से अबतक चांद पर कोई दूसरा मिशन नहीं गया है. 1972 के बाद वहां किसी इंसान ने कदम नहीं रखा.
मगर जल्दी स्थिति बदल सकती है क्योंकि कई कंपनियां चांद पर जाने और इसकी सतह पर सोना, प्लैटिनम या इलेक्ट्रोनिक्स में इस्तेमाल किए जाने वाले उन खनिजों का खनन करने की संभावनाएं तलाश रही हैं जो धरती पर दुर्लभ हैं.
इससे पहले इसी महीने चीन ने चांद की उस पार वाली सतह पर एक जांच अभियान उतारा है और उसने वहां पर कपास का बीज अंकुरित करने में कामयाबी पाई. चीन यहां पर शोध के लिए नया बेस स्थापित करने की संभावनाएं तलाश रहा है.
जापान की कंपनी आईफ़र्म पृथ्वी और चांद के बीच आने-जाने के लिए एक प्लैटफॉर्म बनाने की योजना कर रही है ताकि जांद के ध्रुवों पर पानी की तलाश की जाए.
मगर क्या ऐसे नियम हैं जो यह सुनिश्चित करें कि एल्ड्रिन जिस वीरानी की बात कर रहे थे, वह बनी रहे? या ऐसा तो नहीं कि पृथ्वी का इकलौता बड़ा प्राकृतिक उपग्रह कारोबार का शिकार हो जाएगा और इसके संसाधनो व ज़मीन पर नियंत्रण के लिए राजनीति होने लगेगी?
अंतरिक्ष में खोगलीय चीज़ों पर मालिकाना हक़ का मसला शीत युद्ध के समय का है, जब अंतरिक्ष अभियानों की शुरुआत हुई थी. जिस समय नासा चांद के लिए पहले अभियान की तैयारी कर रहा था, संयुक्त राष्ट्र ने 1967 में आउटर स्पेस ट्रीटी पेश की, जिसपर अमरीका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने हस्ताक्षर किए.
इस समझौते में कहा गया है, "बाहरी अंतरिक्ष, जिसमें चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंड हैं, उसे कोई राष्ट्र अपना नहीं बना सकता, कब्ज़ा करके या अन्य तरीकों से नियंत्रण करके संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता."
स्पेस स्पेशलिस्ट कंपनी एल्डन अडवाइज़र्स के निदेश जोएन वीलर इस संधि को अंतरिक्ष की महत्वपूर्ण संधि बताती हैं. इससे आर्मस्ट्रॉंग और उनके बाद जिन लोगों ने चांद पर झंडा गाड़ा, उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता. क्योंकि यह संधि किसी भी व्यक्ति, कंपनी या देश को किसी तरह के अधिकार नहीं देती.
व्यावहारिकता में 1969 में चांद पर मालिकाना हक़ और खनन आदि के अधिकारों का कोई ख़ास महत्व नहीं था. मगर अब तकनीक का विकास हुआ है और इस कारण भले ही आज नहीं, मगर भविष्य में फ़ायदे के लिए संसाधनों के दुरुपयोग की आशंका पैदा हो गई है.
Friday, January 18, 2019
习近平的中国:从“秦岭违建”案看其绝对权力的强化
原中共陕西省委书记、现全国人大内务司法委员会副主任赵正永被查。赵之落马原因显然包括“秦岭违建”案。中共最近制作了一部名为《一抓到底正风纪》的专题片在全国播放,该片讲述的正是“秦岭违建”的整治情况。在中国,违规建筑很多,以“秦岭违建”为题材专门拍部专题片警示全党,可见在习近平眼中,此非小事。熟悉中国政治的人都清楚,以专题片形式来教育党员干部,表明片中所指的问题已经非常严重,需要党员干部防微杜渐。而片中被点名的原陕西省委主要领导,就是赵正永。
秦岭别墅违建事件指的是在秦岭北麓西安境内多年来违规建设的一批别墅。秦岭素有国家公园之称,是重要的生态保障区,早在2003年陕西省就对秦岭北麓的生态环境进行专项整治,禁止任何单位和个人在此从事房地产开发建设、修建商品住宅和私人别墅,并在2008年专门出台《秦岭生态环境保护条例》。但自2003年来,有开发商陆续在秦岭北麓建造别墅。虽然期间媒体也曾有报道,地方政府也一直在整治,但未能根治。针对秦岭北麓违建问题,习近平在2014年5月进行了第一次批示,可直到2018年7月第六次批示后,专项整治行动才大规模展开,截止2019年1月10日,共清查出1194栋违建别墅,其中依法拆除1185栋、依法没收9栋;依法收回国有土地4557亩、退还集体土地3257亩。与这些别墅相关的腐败案例也被挖出,多个陕西地方官员被问责。
表面看起来,秦岭别墅违建案时间之长数量之多在同类案件中罕见,但比起习近平每天要面对和处理的军国大事来,这其实算不了什么,此类事情批示一次就了不起,批示两次表示非常重视了,但在前后4年中,竟劳驾习批示了六次。那么问题来了,习为何要纠缠此事不放?原因在于,它触动了习近平绝对权力的神经,这是“秦岭违建”案的本质所在。
习近平上台以来尤其是被封为核心后,中国当局一直在强调政治规矩政治纪律,强调四个意识和两个维护,然而,从该专题片披露的情况看,陕西地方政府对习的批示和指示敷衍了事,以“批示”贯彻“批示”,阳奉阴违,落实不力,简直不把习的权威放在眼里。可见,违建之事是小,习近平说话是否管用才是大问题。在习近平看来,如何对待自己的指令,在党的高级干部中说话是否管用,关乎自己的绝对权力和党国绝对主义统治能否建立以及持续的问题,这就绝不是小事。而陕西当局和赵正永正是在此事上犯了大忌,用专题片的话说,是政治站位不对。
然而,完全“指责”陕西地方当局和赵正永对习的指示批示不重视,贯彻不力,即使是站在中央的立场上,也似乎不尽然,更准确的说法应该是,赵正永和西安市委书记魏民洲等用自己的“批示”来落实习的“批示”而不亲历亲为,是迷信了书记“批示”的效用,同时与他们政治敏感性不强,没有预见习的绝对权力的发展有关。
习近平对“秦岭违建”案的首次批示是在2014年5月,此时习上台也就一年半,虽然他上台伊始即表现出很大的权力,但毕竟尚未成为权力核心,估计陕西省市两级党政领导当时也就把习看作比胡锦涛强势一点的总书记,没有想到习会有后来的绝对权力。若他们预见到了这个趋势,或者习近平首次批示时就表现得像现在这样全权在手,相信他们绝对会亲历亲为,亲自挂帅去落实习的批示的。专题片重点讲述的就是陕西当局对习第一次批示落实不力的情况。到赵正永2016年4月因年龄到点转任人大时,十八届六中全会尚未召开,习的核心地位还未确立。因此,看待“秦岭违”事件应注意这个时间背景。
秦岭别墅违建事件指的是在秦岭北麓西安境内多年来违规建设的一批别墅。秦岭素有国家公园之称,是重要的生态保障区,早在2003年陕西省就对秦岭北麓的生态环境进行专项整治,禁止任何单位和个人在此从事房地产开发建设、修建商品住宅和私人别墅,并在2008年专门出台《秦岭生态环境保护条例》。但自2003年来,有开发商陆续在秦岭北麓建造别墅。虽然期间媒体也曾有报道,地方政府也一直在整治,但未能根治。针对秦岭北麓违建问题,习近平在2014年5月进行了第一次批示,可直到2018年7月第六次批示后,专项整治行动才大规模展开,截止2019年1月10日,共清查出1194栋违建别墅,其中依法拆除1185栋、依法没收9栋;依法收回国有土地4557亩、退还集体土地3257亩。与这些别墅相关的腐败案例也被挖出,多个陕西地方官员被问责。
表面看起来,秦岭别墅违建案时间之长数量之多在同类案件中罕见,但比起习近平每天要面对和处理的军国大事来,这其实算不了什么,此类事情批示一次就了不起,批示两次表示非常重视了,但在前后4年中,竟劳驾习批示了六次。那么问题来了,习为何要纠缠此事不放?原因在于,它触动了习近平绝对权力的神经,这是“秦岭违建”案的本质所在。
习近平上台以来尤其是被封为核心后,中国当局一直在强调政治规矩政治纪律,强调四个意识和两个维护,然而,从该专题片披露的情况看,陕西地方政府对习的批示和指示敷衍了事,以“批示”贯彻“批示”,阳奉阴违,落实不力,简直不把习的权威放在眼里。可见,违建之事是小,习近平说话是否管用才是大问题。在习近平看来,如何对待自己的指令,在党的高级干部中说话是否管用,关乎自己的绝对权力和党国绝对主义统治能否建立以及持续的问题,这就绝不是小事。而陕西当局和赵正永正是在此事上犯了大忌,用专题片的话说,是政治站位不对。
然而,完全“指责”陕西地方当局和赵正永对习的指示批示不重视,贯彻不力,即使是站在中央的立场上,也似乎不尽然,更准确的说法应该是,赵正永和西安市委书记魏民洲等用自己的“批示”来落实习的“批示”而不亲历亲为,是迷信了书记“批示”的效用,同时与他们政治敏感性不强,没有预见习的绝对权力的发展有关。
习近平对“秦岭违建”案的首次批示是在2014年5月,此时习上台也就一年半,虽然他上台伊始即表现出很大的权力,但毕竟尚未成为权力核心,估计陕西省市两级党政领导当时也就把习看作比胡锦涛强势一点的总书记,没有想到习会有后来的绝对权力。若他们预见到了这个趋势,或者习近平首次批示时就表现得像现在这样全权在手,相信他们绝对会亲历亲为,亲自挂帅去落实习的批示的。专题片重点讲述的就是陕西当局对习第一次批示落实不力的情况。到赵正永2016年4月因年龄到点转任人大时,十八届六中全会尚未召开,习的核心地位还未确立。因此,看待“秦岭违”事件应注意这个时间背景。
Thursday, January 10, 2019
गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है ऋतिक की डेब्यू फिल्म का नाम, मिले थे कुल 92 अवार्ड्स
ऋतिक रोशन 10 जनवरी को 44वां जन्मदिन मना रहे हैं। बॉलीवुड में ऋतिक ने साल 2000 में फिल्म कहो न प्यार है से डेब्यू किया था। ऋतिक की यह फिल्म ब्लॉकबस्टर थी और वे रातों-रात सुपर स्टार बन गए थे। इतना ही नहीं फिल्म को साल 2002 के गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के एडीशन में सबसे ज्यादा अवार्ड्स पाने के लिए शामिल किया गया था।
कहाे न प्यार है से जुड़ी खास बातें
ऋतिक की रियल लाइफ में भी फिल्म के जैसी लव स्टोरी थी। रियल लाइफ में ऋतिक, वाइफ सुजैन से ठीक उसी तरह मिले थे, जैसे वे फिल्म कहो न प्यार है में सोनिया यानी अमीषा पटैल से मिलते हैं। यानी ट्रैफिक सिग्नल पर।
ऋतिक फैक्टर और न्यूजीलैंड
साल 2000 में फिल्म के रिलीज होने के बाद ऋतिक फैक्टर के चलते स्टूडेंट्स और टूरिस्ट्स के बीच न्यूजीलैंड फेमस हो गया था। वीजा अधिकारियों के मुताबिक उस दौरान करीब वीजा परमिट्स की लिमिट को 5 लाख यूएस डॉलर तक बढ़ाना पड़ा था।
फिल्म के ब्लॉकबस्टर होने के बाद राकेश रोशन पर माफिया ने हमला कर दिया था। बात 21 जनवरी, 2000 की है। इस हमले में एक गोली उनके गंधे पर और दूसरी उनकी छाती पर लगी थी। हालांकि, उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी जान बचा ली गई। ये हमला उन्हें धमकाने के लिए था ताकि वे अपनी ब्लॉकबस्टर फिल्म 'कहो ना प्यार है' के प्रॉफिट में से माफिया को हिस्सा दें।
कैम्पेन मॉडल बने ऋतिक
पूरी फिल्म के दौरान कोल्ड ड्रिंक कोकाकोला का इंडायरेक्टली विज्ञापन हुआ था। फिल्म के सुपरहिट होने के बाद कोका-कोला ने ऋतिक को उनके कैम्पेन मॉडल के तौर पर साइन कर लिया था।
हाथ छिपाने बने रहे लेफ्टी
फिल्म में अपने दाएं हाथ की छठी अंगुली यानी दूसरे अंगूठे को छिपाने ऋतिक ने पूरी शूटिंग के दौरान हैंड ग्लोव्स पहने थे। इसलिए वे फिल्म में लेफ्टी बने रहे यानी पूरे शॉट्स उन्होंने बाएं हाथ से दिए।
अमीषा पटैल की मां थीं फिल्म में
बेटी की डेब्यू फिल्म में अमीषा की मां आशा पटैल ने भी काम किया था। दरअसल ऋतिक के डबल रोल यानी राज की मां के रोल में अमीषा पटैल की मां ही थीं। हालांकि इस फिल्म से पहले अमीषा की फैमिली ने उन्हें फिल्मों मे काम करने से मना कर दिया था।
करीना और शाहरुख थे पहली पसंद
फिल्म की पहली स्टार कास्ट के तौर पर पहले शाहरुख खान और करीना कपूर को चुना गया था। लेकिन शाहरुख के मना करने और शूटिंग शुरू होने चंद दिनों बाद ही करीना की मां से हुए विवाद के बाद स्टार कास्ट बदल गई। बाद में यह अमीषा और ऋतिक की डेब्यू फिल्म बनी।
फेस ऑफ से लिया इंस्पीरेशन
1997 में आई हॉलीवुड फिल्म फेस ऑफ से फिल्म के कई सीन्स इंस्पायर्ड रहे हैं। जैसे जब ऋतिक फिल्म में अपने छोटे भाई के चेहरे पर हाथ फेरते हैं। जब ऋतिक बाइक पर जा रहे होते हैं और पुलिस उनका पीछा करती है। इसी फिल्म के म्यूजिक का भी कुछ हिस्सा कहो न प्यार है में सुनाई देता है।
म्यूजिक के सारे अवार्ड्स जीतने वाली दूसरी फिल्म
शाहरुख की फिल्म दिल से के बाद ऋतिक की यह फिल्म म्यूजिक के लिए सारे अवार्ड्स जीतने वाली दूसरी फिल्म थी। फिल्म को बेस्ट म्यूजिक, लिरिक्स, प्लेबैक सिंगर मेल, कोरियोग्राफी का अवार्ड्स मिले। लेकिन ये सभी अलग-अलग सॉन्ग्स के लिए थे।
कहाे न प्यार है से जुड़ी खास बातें
ऋतिक की रियल लाइफ में भी फिल्म के जैसी लव स्टोरी थी। रियल लाइफ में ऋतिक, वाइफ सुजैन से ठीक उसी तरह मिले थे, जैसे वे फिल्म कहो न प्यार है में सोनिया यानी अमीषा पटैल से मिलते हैं। यानी ट्रैफिक सिग्नल पर।
ऋतिक फैक्टर और न्यूजीलैंड
साल 2000 में फिल्म के रिलीज होने के बाद ऋतिक फैक्टर के चलते स्टूडेंट्स और टूरिस्ट्स के बीच न्यूजीलैंड फेमस हो गया था। वीजा अधिकारियों के मुताबिक उस दौरान करीब वीजा परमिट्स की लिमिट को 5 लाख यूएस डॉलर तक बढ़ाना पड़ा था।
फिल्म के ब्लॉकबस्टर होने के बाद राकेश रोशन पर माफिया ने हमला कर दिया था। बात 21 जनवरी, 2000 की है। इस हमले में एक गोली उनके गंधे पर और दूसरी उनकी छाती पर लगी थी। हालांकि, उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी जान बचा ली गई। ये हमला उन्हें धमकाने के लिए था ताकि वे अपनी ब्लॉकबस्टर फिल्म 'कहो ना प्यार है' के प्रॉफिट में से माफिया को हिस्सा दें।
कैम्पेन मॉडल बने ऋतिक
पूरी फिल्म के दौरान कोल्ड ड्रिंक कोकाकोला का इंडायरेक्टली विज्ञापन हुआ था। फिल्म के सुपरहिट होने के बाद कोका-कोला ने ऋतिक को उनके कैम्पेन मॉडल के तौर पर साइन कर लिया था।
हाथ छिपाने बने रहे लेफ्टी
फिल्म में अपने दाएं हाथ की छठी अंगुली यानी दूसरे अंगूठे को छिपाने ऋतिक ने पूरी शूटिंग के दौरान हैंड ग्लोव्स पहने थे। इसलिए वे फिल्म में लेफ्टी बने रहे यानी पूरे शॉट्स उन्होंने बाएं हाथ से दिए।
अमीषा पटैल की मां थीं फिल्म में
बेटी की डेब्यू फिल्म में अमीषा की मां आशा पटैल ने भी काम किया था। दरअसल ऋतिक के डबल रोल यानी राज की मां के रोल में अमीषा पटैल की मां ही थीं। हालांकि इस फिल्म से पहले अमीषा की फैमिली ने उन्हें फिल्मों मे काम करने से मना कर दिया था।
करीना और शाहरुख थे पहली पसंद
फिल्म की पहली स्टार कास्ट के तौर पर पहले शाहरुख खान और करीना कपूर को चुना गया था। लेकिन शाहरुख के मना करने और शूटिंग शुरू होने चंद दिनों बाद ही करीना की मां से हुए विवाद के बाद स्टार कास्ट बदल गई। बाद में यह अमीषा और ऋतिक की डेब्यू फिल्म बनी।
फेस ऑफ से लिया इंस्पीरेशन
1997 में आई हॉलीवुड फिल्म फेस ऑफ से फिल्म के कई सीन्स इंस्पायर्ड रहे हैं। जैसे जब ऋतिक फिल्म में अपने छोटे भाई के चेहरे पर हाथ फेरते हैं। जब ऋतिक बाइक पर जा रहे होते हैं और पुलिस उनका पीछा करती है। इसी फिल्म के म्यूजिक का भी कुछ हिस्सा कहो न प्यार है में सुनाई देता है।
म्यूजिक के सारे अवार्ड्स जीतने वाली दूसरी फिल्म
शाहरुख की फिल्म दिल से के बाद ऋतिक की यह फिल्म म्यूजिक के लिए सारे अवार्ड्स जीतने वाली दूसरी फिल्म थी। फिल्म को बेस्ट म्यूजिक, लिरिक्स, प्लेबैक सिंगर मेल, कोरियोग्राफी का अवार्ड्स मिले। लेकिन ये सभी अलग-अलग सॉन्ग्स के लिए थे।
Thursday, January 3, 2019
बंद पड़े ट्विटर अकाउंट्स को हैक कर आतंकी गतिविधियों का प्रचार कर रहे आईएस समर्थक
गैजेट डेस्क. आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के समर्थक ट्विटर पर पुराने अकाउंट्स का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के प्रचार में कर रहे हैं। टेकक्रंच ने अपनी रिपोर्ट में इसका दावा किया। रिपोर्ट के मुताबिक, सालों से बंद पड़े कुछ ट्विटर अकाउंट अचानक से एक्टिव हो गए हैं। अरबी भाषा में किए जा रहे ट्वीट्स में आतंक को बढ़ावा देने वाले कंटेंट को शेयर किया जा रहा है। साथ ही इस काम की तारीफ भी की जा रही है।
टेकक्रंच ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आईएसआईएस समर्थक हैकर्स ने ट्विटर के सिक्योरिटी फीचर में खामी का फायदा उठाकर बंद पड़े अकाउंट्स को हैक किया। अब इसका इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कई सालों तक ट्विटर पर अकाउंट बनाने के लिए ईमेल एड्रेस को वेरिफाई करने की जरूरत नहीं होती थी, जिसका मतलब था कि यूजर्स किसी भी नकली ईमेल एड्रेस के साथ साइन-अप कर सकते थे। हालांकि, अब ट्विटर पर अकाउंट बनाने के लिए ईमेल एड्रेस या फोन नंबर वेरिफाई करना होता है।
टेकक्रंच का कहना है कि, हैकर्स ने जिन यूजर्स के ट्विटर अकाउंट्स सालों से बंद पड़े थे, उनके ईमेल एड्रेस का भी पता लगाया। इस ईमेल एड्रेस की मदद से हैकर्स ने पुराने अकाउंट्स को फिर से शुरू किया।
यूजर्स की गलती से भी हैकर्स को मदद मिली
ट्विटर पर रजिस्टर करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ईमेल एड्रेस को शो नहीं किया जाता। लेकिन हैकर्स आसानी से इस ईमेल एड्रेस का पता लगा सकते थे। दरअसल, कई मामलों में यूजर्स ने अपने यूजरनेम जैसा ही ईमेल एड्रेस बनाया था और इसी वजह से आईएसआईएस के समर्थक या हैकर्स इसका अनुमान लगा सके।
इसके बाद हैकर्स ने एक नकली ईमेल एड्रेस बनाया और बंद पड़े ट्विटर अकाउंट का पासवर्ड रिसेट किया। इसकी मदद से हैकर्स की पहुंच उन अकाउंट्स तक हो गई, जो सालों से बंद पड़े थे या जिनका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था। अकाउंट्स हैक करने के बाद हैकर्स ने उन अकाउंट्स से आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों का प्रचार करने वाले फोटो, वीडियो या कंटेंट पोस्ट किए।
यूजर ने भी अलग ईमेल एड्रेस बनाया: सिक्योरिटी रिसर्चर
आईएसआईएस की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने वाले और सिक्योरिटी रिसर्चर वॉचुला घोस्ट ने टेक क्रंच को बताया, "इस खामी के बारे में कोई नहीं जानता था और न ही ये जानता था कि इसका फायदा किस तरह से उठाया जा सकता है? लेकिन अब हमने इस्लामिक स्टेट का समर्थन करने वालों की पहचान की है, जिन्होंने इस खामी का फायदा उठाया।"
उन्होंने पाया कि ट्विटर पर कई ऐसे अकाउंट थे, जो सालों से बंद पड़े थे और उन्हें हाल ही में हैक किया गया था। उन्होंने बताया, "मैंने जिन इनएक्टिव अकाउंट को देखा तो पाया कि ज्यादातर यूजर्स ने नकली ईमेल एड्रेस से साइन-अप किया था और ये ईमेल एड्रेस उनके अकाउंट से लिंक नहीं था।"
वॉचुला घोस्ट ने बताया कि ईमेल एड्रेस का पता लगाना थोड़ा मुश्किल है लेकिन ज्यादातर ट्विटर अकाउंट को @hotmail.com या @yahoo.com पर बनाया गया था।
पिछले साल ट्विटर ने 12 लाख अकाउंट हटाए थे
अप्रैल 2018 में ट्विटर ने अपनी ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट में बताया था कि, अगस्त 2015 के बाद से आतंक को बढ़ावा देने वाले 12 लाख से ज्यादा अकाउंट्स को अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया था।
इसमें से 93% अकाउंट को ट्विटर के इंटरनल टूल्स और एल्गोरिदम के जरिए हटाया गया था जबकि 74% ऐसे अकाउंट्स थे, जिन्हें पहला ट्वीट करने से पहले ही प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया था।
टेकक्रंच ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आईएसआईएस समर्थक हैकर्स ने ट्विटर के सिक्योरिटी फीचर में खामी का फायदा उठाकर बंद पड़े अकाउंट्स को हैक किया। अब इसका इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कई सालों तक ट्विटर पर अकाउंट बनाने के लिए ईमेल एड्रेस को वेरिफाई करने की जरूरत नहीं होती थी, जिसका मतलब था कि यूजर्स किसी भी नकली ईमेल एड्रेस के साथ साइन-अप कर सकते थे। हालांकि, अब ट्विटर पर अकाउंट बनाने के लिए ईमेल एड्रेस या फोन नंबर वेरिफाई करना होता है।
टेकक्रंच का कहना है कि, हैकर्स ने जिन यूजर्स के ट्विटर अकाउंट्स सालों से बंद पड़े थे, उनके ईमेल एड्रेस का भी पता लगाया। इस ईमेल एड्रेस की मदद से हैकर्स ने पुराने अकाउंट्स को फिर से शुरू किया।
यूजर्स की गलती से भी हैकर्स को मदद मिली
ट्विटर पर रजिस्टर करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ईमेल एड्रेस को शो नहीं किया जाता। लेकिन हैकर्स आसानी से इस ईमेल एड्रेस का पता लगा सकते थे। दरअसल, कई मामलों में यूजर्स ने अपने यूजरनेम जैसा ही ईमेल एड्रेस बनाया था और इसी वजह से आईएसआईएस के समर्थक या हैकर्स इसका अनुमान लगा सके।
इसके बाद हैकर्स ने एक नकली ईमेल एड्रेस बनाया और बंद पड़े ट्विटर अकाउंट का पासवर्ड रिसेट किया। इसकी मदद से हैकर्स की पहुंच उन अकाउंट्स तक हो गई, जो सालों से बंद पड़े थे या जिनका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था। अकाउंट्स हैक करने के बाद हैकर्स ने उन अकाउंट्स से आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों का प्रचार करने वाले फोटो, वीडियो या कंटेंट पोस्ट किए।
यूजर ने भी अलग ईमेल एड्रेस बनाया: सिक्योरिटी रिसर्चर
आईएसआईएस की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने वाले और सिक्योरिटी रिसर्चर वॉचुला घोस्ट ने टेक क्रंच को बताया, "इस खामी के बारे में कोई नहीं जानता था और न ही ये जानता था कि इसका फायदा किस तरह से उठाया जा सकता है? लेकिन अब हमने इस्लामिक स्टेट का समर्थन करने वालों की पहचान की है, जिन्होंने इस खामी का फायदा उठाया।"
उन्होंने पाया कि ट्विटर पर कई ऐसे अकाउंट थे, जो सालों से बंद पड़े थे और उन्हें हाल ही में हैक किया गया था। उन्होंने बताया, "मैंने जिन इनएक्टिव अकाउंट को देखा तो पाया कि ज्यादातर यूजर्स ने नकली ईमेल एड्रेस से साइन-अप किया था और ये ईमेल एड्रेस उनके अकाउंट से लिंक नहीं था।"
वॉचुला घोस्ट ने बताया कि ईमेल एड्रेस का पता लगाना थोड़ा मुश्किल है लेकिन ज्यादातर ट्विटर अकाउंट को @hotmail.com या @yahoo.com पर बनाया गया था।
पिछले साल ट्विटर ने 12 लाख अकाउंट हटाए थे
अप्रैल 2018 में ट्विटर ने अपनी ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट में बताया था कि, अगस्त 2015 के बाद से आतंक को बढ़ावा देने वाले 12 लाख से ज्यादा अकाउंट्स को अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया था।
इसमें से 93% अकाउंट को ट्विटर के इंटरनल टूल्स और एल्गोरिदम के जरिए हटाया गया था जबकि 74% ऐसे अकाउंट्स थे, जिन्हें पहला ट्वीट करने से पहले ही प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया था।
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